लड़ाई प्यार की - (भाग २)
अब आगे... रात के ११ बज रहे थे। मगर हवेली के एक कमरे में अभी भी लाईट जल रही थी। और वो कमरा था आनंदी का। जो अपने आलीशान कमरे के गद्देदार बेड पर बैठी थी। वो ख़ामोश और मायुस बैठी अपनी आँखें भरे। एकटक अपने बेटे की तस्वीर देखती रहती है। वो अजय की तस्वीर देखती-देखती कुछ सोंच की दुनीयां में चली जाती है... "आ..आ...आ...माँ ना मारो, लग रहा है।" अजय रोते हुए छटपटा कर इधर-उधर भागते हुए बोला। मगर आनंदी तो उसे हरे लतेदार डंडे से पीटते ही जा रही थी। "लग रहा है नालायक, आँ...बोल! जब देखो तब मेरे पीछे ही जासूसी करता रहता है। मुझे बदनाम करता है, अपनी माँ को! मेरा खा कर मुझे ही धौंस दीखाता है, बीत्ते भर का है और बाते बड़ी-बड़ी।" आनंदी बोलते हुए अजय को पीटे जा रही थी। और बेचारा अज़य रोते हुए छटपटाता रहता है। सवीता और रागीनी आगे बढ़ कर आनंदी को पकड़ कर रोकने लगती है। मगर आनंदी उन्हे भी झटक देती है। और गुस्से में बोली- आनंदी: "सुक्खे...!" तभी सुक्खे दौड़कर आता है। सुक्खे: "जी...मालकीन!" आनंदी: "ले जा इसे कोठरी में बंद कर दे। और जब तक मैं ना कहूँ, इसे ...